21 जनवरी 1974 की बात है । उस समय झारखंड, बिहार का ही हिस्सा हुआ करता था, और बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर थे। उन दिनों एक नेता हुआ करते थे — विश्वनाथ मोदी। उन्होंने झुमरी तिलैया में एक भाषण दिया, जिसके बाद उन्होंने जनसमूह को साथ लेकर एक रैली निकाली।
जब रैली सरकारी बस स्टैंड के पास पहुँची, तब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद भीड़ कुछ उग्र हो गई। भीड़ थोड़ा आगे बढ़ी और रेलवे स्टेशन के पास पहुँची, जहाँ कुछ लोगों ने एक खड़ी मालगाड़ी पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।
इसके बाद पुलिस ने रेलवे प्लेटफॉर्म से गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं, और लगभग 20 से 30 मिनट तक गोलियाँ चलती रहीं।
मैं भी उस भीड़ में शामिल था। उस समय मैं स्कूल में मैट्रिक में पढ़ता था और एन.सी.सी. (NCC) का छात्र भी था। एनसीसी में हमें सिखाया गया था कि गोली चलने के समय भागना नहीं चाहिए, क्योंकि गोली की रफ़्तार इंसान की रफ़्तार से सैकड़ों गुना तेज़ होती है।
इसलिए मैं वहीं स्टेशन के उस पार, जहाँ बजरंग बली का छोटा मंदिर है, मंदिर के पीछे दीवार के पास छिप गया। मंदिर के सामने जहाँ अब शीतल छाया होटल है, उस समय वहाँ बिल्कुल खाली मैदान था।
मेरे साथ एक आदमी और था, जो भाग रहा था — उसका नाम राम बालक रजक था। वह धोबी था और हमारे घर के कपड़े धोया करता था। आज जिसे सोना पट्टी रोड कहते हैं, वहीं उसकी दुकान हुआ करती थी। मैंने उसे भी वहीं बुला लिया। तभी एक आदमी को गोली लगी और उसका खून उस धोबी के कपड़ों पर गिरने लगा।
मेरे सामने भागते हुए लोगों को गोलियाँ लग रही थीं, वे सड़क पर गिरकर तड़प रहे थे, लेकिन मैं उनकी कोई मदद नहीं कर पा रहा था। क्योंकि जैसे ही मैं मंदिर की दीवार से थोड़ा भी बाहर निकलता, मुझे भी गोली लग सकती थी।
मंदिर के पीछे जहाँ मैं छिपा था, वहाँ रेलवे लाइन का एक घेरा बना था। मैं उसी को पकड़कर बैठा था। जब कहीं भी रेलवे लाइन पर गोली लगती, तो पूरी लाइन झनझना उठती थी। उस समय रेलवे लाइन पकड़कर रहना भी बहुत मुश्किल था, पर मैं मजबूती से पकड़े रहा।
जब गोलीबारी बंद हुई, तब पुलिस की गाड़ियाँ आईं और जो भी घायल या मृत लोग वहाँ पड़े थे, उन्हें बोरों में भरकर गाड़ियों में लाद रही थीं। मुझसे भी हाथ लगाने को कहा गया, लेकिन मैं बहुत डरा हुआ था। इसलिए मैं वहाँ से भागकर सीधे अपने घर चला गया।
फिर पूरे झुमरी तिलैया में कर्फ़्यू लगा दिया गया।
कर्फ़्यू लगने के बाद पुलिस का अत्याचार शुरू हो गया। वे किसी को भी पकड़कर पीटने लगीं। कई घरों में घुसकर पुरुषों को गिरफ्तार कर ले गईं। मुझे आज भी याद है, पुलिस जिन लोगों को पीटते हुए ले गई थी — उनमें स्वर्गीय मुन्नीलाल और स्वर्गीय शंकर तरवे भी शामिल थे।
उस दिन, 21 जनवरी 1974 के उस गोलीकांड में बहुत से लोगों को गोलियाँ लगी थीं और कईयों की मृत्यु भी हुई थी। मेरे आस-पास से ही पुलिस ने 9 से 10 शव उठाकर ले गई। लेकिन रात में ऑल इंडिया रेडियो पर सिर्फ़ दो लोगों के घायल होने की खबर दी गई थी।
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